संडे व्यू : करतारपुर का चमत्कार, इंसाफ होते हुए दिखना भी है जरूरी

आधुनिक युग का चमत्कार है करतारपुर कॉरिडोर

गोपालकृष्ण गांधी ने द टेलीग्राफ में लिखा है कि करतारपुर कॉरिडोर वास्तव में आधुनिक युग का चमत्कार है. बगैर वीजा के पाकिस्तान के अंदर चार किलोमीटर तक श्रद्धालु जाएं और आधी सहस्राब्‍दी पूर्व जन्मे सिखों के पहले गुरु के जन्मदिन पर उन्हें याद करें. वर्तमान तनावपूर्ण परिप्रेक्ष्य में यह किसी चमत्कार से कम नहीं है. भारत और पाकिस्तान के बीच हर क्षण युद्ध का ख़तरा है. मगर, ऐसे में डेरा बाबा नानक और गुरुद्वारा दरबार साहिब का एक गलियारे से जुड़ना ऐतिहासिक है.

लेखक ने लिखा है कि इसका श्रेय अटल बिहारी वाजपेयी और नवाज़ शरीफ़ को दिया जा सकता है जिन्होंने इस सोच की बुनियाद रखी थी.
खास बात ये है कि इनमें से कोई भी न सिख थे और न ही सिखों के वोटों के मोहताज रहे. इस सोच को बढ़ाने का श्रेय इंद्र कुमार गुजराल को भी है और मनमोहन सिंह को भी. बर्लिन की दीवार से इसकी तुलना करने वाले नरेंद्र मोदी और इमरान ख़ान को भी इसका श्रेय है.

मगर, सबसे अधिक अगर किन्हीं को श्रेय जाता है तो वे खुद गुरुनानक देव हैं जो आधी सदी बाद भी अपनी अहमियत को सीमाएं मिटाकर बनाए हुए हैं. नफरत, लालच और अहंकार मुक्त जीवन की प्रेरणा देने वाले नानक की शिक्षा ही लोगों को एक-दूसरे से जोड़ रही है.

लेखक की सलाह है कि भारत और पाकिस्तान अतीत के आईने में झांकें और एक-दूसरे के लिए और अधिक मुक्त हों, तो आम जनता का भला होगा. आध्यात्मिक और प्राचीन सभ्यता की साझी विरासत को दोनों देश की जनता साझा कर सकती हैं, परस्पर लाभ उठा सकती है.

बेपर्द होने लगे हैं गठबंधन

डॉ पुष्पेश पंत ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस में बेपर्द होते गठबंधन की ओर ध्यान दिलाते हुए राजनीतिक दलों के नेतृत्व के अहंकार का मसला उठाया है. बीजेपी और शिवसेना के बीच ऐसे समय में अलगाव हुआ जब अयोध्या पर आए फैसले से इनके बीच दूरियां कम हो सकती थीं.

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मगर, दोनों दलों के कार्यकर्ता निराश रहे. शिवसेना एनडीए छोड़ने को मजबूर हुई. वहीं, महाराष्ट्र में सरकार बनाने की पहल कांग्रेस से फिसलकर एनसीपी प्रमुख शरद पवार के हाथों में पहुंच गयी. हालांकि अब तक ये कोशिशें परवान नहीं चढ़ सकी हैं.

पंत लिखते हैं कि बीजेपी हरियाणा में चुनाव नतीजों से मिले जख्म सहला रही है. नमो के चमत्कार पर भरोसा कर रही बीजेपी बमुश्किल हार से बच पायी, वहीं महाराष्ट्र में भी उसे सदमा लगा है. इन चुनावों में अमित शाह के चाणक्य वाली भूमिका को भी नुकसान पहुंचा है. अब झारखण्ड और दिल्ली की लड़ाई महत्वपूर्ण हो चली है.

आने वाले समय में नये-नये गठबंधन देखने को मिल सकते हैं. देश की आर्थिक स्थिति चिंताजनक है. एशियाई व्यापार में जगह बनाने के संघर्ष में चीन ने पहल ले ली है और भारत ने अपनी मर्जी से खुद को बाहर रखने का विकल्प चुना है. राष्ट्रीय स्तर पर केवल दलगत सियासत में उलझने से 2014 के बाद जो देश ने विश्व स्तर पर अग्रता हासिल की थी, उसके खोने का खतरा पैदा हो गया है.

SC का निरपेक्ष रहना ही नहीं दिखना भी जरूरी

एसए अय्यर ने टाइम्स ऑफ इंडिया में अपने नियमित कॉलम स्वामीनॉमिक्स में लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट के लिए न सिर्फ पक्षपात रहित रहना चाहिए बल्कि दिखना भी चाहिए. हाल में लगातार चार फैसलों के बाद यह प्रश्न पैदा हुआ है कि कहीं सुप्रीम कोर्ट के फैसले बीजेपी की ओर झुकी हुई तो नहीं? हालांकि इस शुबहा को तोड़ने वाले उदाहरण भी हैं.

बाबरी मस्जिद केस में सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि हिन्दू मूर्ति मस्जिद के भीतर ले जायी गयीं और मस्जिद को 1992 में गिरा दिया गया. फिर भी विवादास्पद ज़मीन राम मंदिर बनाने के लिए ट्रस्ट को दे दी गयी. कई धर्मनिरपेक्ष हिन्दू और मुसलमान इससे निराश हैं.

राफेल सौदे में अनियमितता को लेकर पुनर्विचार याचिका भी सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दी. अब आगे संयुक्त संसदीय समिति से जांच की कांग्रेस की मांग पर शायद ही कोई ध्यान दे. तीसरा केस सबरीमाला का है जहां महिलाओं के प्रवेश की अनुमति के अपने फैसले पर सुप्रीम कोर्ट फिर से विचार करेगी.

वहीं चौथे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक में दलबदल विधेयक को धोखा देते हुए कांग्रेस छोड़ने वाले विधायकों की अनिश्चितकालीन अयोग्यता को सीमित कर देने का आदेश सुनाया है. इससे उन विधायकों को उनके मन मुताबिक दोबारा जीतकर आने और बीजेपी सरकार में मंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया है. सुकून की बात ये है कि बाबरी मस्जिद गिराने की साजिश रचने वाले मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2020 तक लखनऊ में ट्रायल पूरा करने का आदेश सुनाया है. इस मामले में आडवाणी, उमा समेत कई बीजेपी नेता आरोपी हैं.

नेतृत्व खोज रही है कांग्रेस

तवलीन सिंह ने जनसत्ता में लिखा है कि कांग्रेस में उनके जानने वाले बता रहे हैं कि राहुल गांधी एक बार फिर विरासत सम्भाल सकते हैं. लोकसभा चुनाव में हार के बाद से राहुल लगातार गायब दिख रहे हैं. सर्वोच्च न्यायालय ने नये सिरे से राहुल गांधी की याद देश को दिला दी है.

राहुल गांधी फिर एक बार संभाल सकते हैं विरासतराफेल मामले में फटकार लगाकर उन्हें आईना दिखा दिया है. तवलीन लिखती हैं कि एक तरह से राहुल को संदेश मिल गया है कि ‘चौकीदार चोर है’ जैसे नकारात्मक नारे पर नरेंद्र मोदी से लड़ाई मुश्किल है.

तवलीन सिंह लिखती हैं कि अगर देश में विपक्ष ने मोदी सरकार की कमियों को लेकर जनता के बीच जाने का काम किया होता तो आज आर्थिक मंदी सबसे बड़ा मुद्दा होती. यह काम कांग्रेस नहीं कर पा रही है. नतीजा यह है कि मोदी सरकार के मंत्री अहंकार में आ गये हैं. वे ऐसा बर्ताव करने लगे हैं मानो वे चुनाव जीतकर देश के मालिक बन गये हैं.

लेखिका का मानना है कि इस अहंकार को तोड़ना जरूरी है. मगर, ऐसा तभी हो सकता है जब कांग्रेस किसी वारिस को खोजने के बजाए वास्तव में अपने नेतृत्व को खोजे.

कांग्रेस को गांधी नहीं नेतृत्व चाहिए

रामचंद्र गुहा ने अमर उजाला में वंशानुगत राजनीति पर कलम चलायी है. वे लिखते हैं कि महात्मा गांधी के चार बेटे थे. कोई राजनीति में फलने-फूलने नहीं आया. मगर, चाहे पंडित नेहरू हों या वल्लभ भाई पटेल, राजगोपालाचारी हों या फिर गोविन्द बल्लभ पंत- सबके चिराग राजनीति में प्रज्जवलित हुए. इंदिरा गांधी 1959 में ही कांग्रेस की अध्यक्ष बन गयी थीं.

महात्मा गांधीफिर भी कुनबापरस्ती की शुरुआत 1975 में शुरू हुई जब उन्होंने संजय गांधी को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया. संजय की असामयिक मृत्यु के बाद जब राजीव को राजनीति में लाया गया, तब यह और स्पष्ट हुआ. वे लिखते हैं कि 1975 से पहले और 1991-98 के बीच कांग्रेस कुनबापरस्ती से दूर रही और फली-फूली.

रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि बीजेपी में नरेंद्र मोदी का नेतृत्व स्वाभाविक है. उनकी मेहनत, संघर्षक्षमता, उनका अच्छा वक्ता होना उन्हें औरों से अलग करता है. यह उनकी ताकत है. अगर विकल्प बनना है तो कांग्रेस को भी अपना स्वाभाविक नेतृत्व खोजना होगा.

वे लिखते हैं कि सोनिया गांधी कांग्रेस को एकजुट नहीं रह सकीं. वाईएसआर कांग्रेस, एनसीपी, तृणमूल कांग्रेस का जन्म कांग्रेस से टूटकर हुआ. आज मूल कांग्रेस और कांग्रेस से पैदा हुई पार्टियों के सांसदों की संख्या करीब-करीब बराबर है. रामचंद्र गुहा ने लिखा है कि गांधी परिवार यह समझता है कि वह कांग्रेस का कर्ज उतार रहे हैं. मगर वास्तव में अगर देश का कर्ज उतारना है तो उन्हें कांग्रेस से दूर हो जाना चाहिए.

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